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NFHS-6 की चेतावनी: क्या भारत में तेजी से बढ़ रहे C-Section प्रसव मां और नवजात के लिए बन रहे हैं खतरा?

NFHS-6 रिपोर्ट में भारत में बढ़ते C-Section प्रसव और महाराष्ट्र के निजी अस्पतालों में 56 प्रतिशत सीजेरियन डिलीवरी की चिंता | Mother And Baby Matters

NFHS-6 रिपोर्ट में भारत में बढ़ते C-Section प्रसव और महाराष्ट्र के निजी अस्पतालों में 56 प्रतिशत सीजेरियन डिलीवरी की चिंता | Mother And Baby Matters

निजी अस्पतालों में बढ़ती सर्जिकल डिलीवरी ने बढ़ाई चिंता, महाराष्ट्र में 56% प्रसव C-Section से

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। गर्भवती महिलाओं की बेहतर देखभाल, संस्थागत प्रसव और टीकाकरण के आंकड़ों में सुधार दर्ज किया गया है। लेकिन इसी सकारात्मक तस्वीर के बीच राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) ने एक ऐसी चेतावनी दी है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है—देश में C-Section (सीजेरियन) प्रसव तेजी से बढ़ रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब चिकित्सा आवश्यकता हो, तब सी-सेक्शन मां और बच्चे दोनों की जान बचा सकता है। लेकिन अगर यह आवश्यकता के बजाय एक सामान्य प्रक्रिया बन जाए, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

NFHS-6 के अनुसार, देश में सी-सेक्शन से होने वाले प्रसव का प्रतिशत 21.5% से बढ़कर 27.2% हो गया है। शहरी भारत में यह आंकड़ा 40% तक पहुंच चुका है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाए गए 10-15% के आदर्श स्तर से कहीं अधिक है।

आखिर क्यों बढ़ रही है चिंता?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अनावश्यक सी-सेक्शन केवल एक सर्जरी नहीं है। इसके कारण मां को लंबे समय तक दर्द, संक्रमण का खतरा, अधिक खर्च और भविष्य की गर्भावस्थाओं में जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, ऑपरेशन के बाद रिकवरी में समय लगने के कारण मां और नवजात के बीच शुरुआती जुड़ाव तथा स्तनपान की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।

NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी भूमिका निजी अस्पतालों की है। देशभर में निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन की दर 47% से बढ़कर 54% हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर निजी अस्पतालों में होने वाले सी-सेक्शन सरकारी अस्पतालों की तुलना में 37 प्रतिशत अंक अधिक हैं।

महाराष्ट्र बना चिंता का बड़ा केंद्र

स्थिति महाराष्ट्र में और भी गंभीर दिखाई देती है।

द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन की दर 56% तक पहुंच गई है। यानी हर दो में से एक से अधिक प्रसव सर्जरी के जरिए हो रहे हैं।

यह आंकड़ा WHO के निर्धारित मानकों से लगभग पांच गुना अधिक है और यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सभी मामलों में सर्जरी वास्तव में आवश्यक थी।

इसके विपरीत, महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में सी-सेक्शन की दर 33% दर्ज की गई। हालांकि यह भी WHO की सीमा से ऊपर है, लेकिन निजी अस्पतालों की तुलना में काफी कम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच इतना बड़ा अंतर गहन जांच और निगरानी की मांग करता है।

मां का दर्द, बच्चे पर भी असर

सी-सेक्शन से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है स्तनपान में देरी।

Dr Anita Gupta के अनुसार, ऑपरेशन के बाद होने वाला दर्द कई महिलाओं के लिए नवजात को गोद में लेना और स्तनपान कराना मुश्किल बना देता है।

उनका कहना है कि सी-सेक्शन के बाद कई महिलाओं में दूध बनने की प्रक्रिया देर से शुरू होती है और शुरुआती दिनों में दूध की मात्रा भी कम हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू होना बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, संक्रमण से बचाव करने और मां-बच्चे के भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में देरी का असर नवजात के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

अच्छी खबर भी है…

हालांकि सी-सेक्शन के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ाई है, लेकिन मातृ स्वास्थ्य के कई अन्य संकेतकों में सुधार देखने को मिला है।

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पोषण में भी सुधार

गर्भावस्था के दौरान कम से कम 100 दिन तक आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44.1% से बढ़कर 54.9% हो गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर पोषण मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इससे गर्भावस्था संबंधी कई जटिलताओं का जोखिम कम हो सकता है।

भारत के लिए अगली बड़ी स्वास्थ्य चुनौती

NFHS-6 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि भारत मातृ और शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। लेकिन सी-सेक्शन पर बढ़ती निर्भरता अब एक नई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सी-सेक्शन केवल चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए। यदि इसकी बढ़ती प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह माताओं और नवजातों के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।

NFHS-6 के प्रमुख तथ्य

स्रोत: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय | द टाइम्स ऑफ इंडिया

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