आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, टैबलेट और टीवी बच्चों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन बच्चों में स्क्रीन टाइम के नुकसान अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत बच्चों में मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, आंखों की कमजोरी, नींद की समस्या और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का कारण बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन के सामने बढ़ता समय बच्चों की शारीरिक गतिविधियों को कम कर रहा है, जिसका सीधा असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ रहा है।
सात साल के अभिराज की कहानी
सात वर्षीय अभिराज के माता-पिता डॉक्टर के पास इस शिकायत के साथ पहुंचे कि उनके बेटे का वजन लगातार बढ़ रहा है। बातचीत के दौरान पता चला कि अभिराज अक्सर मोबाइल फोन या टीवी देखते हुए खाना खाता था। स्क्रीन में व्यस्त रहने के कारण उसे यह एहसास नहीं होता था कि वह जरूरत से ज्यादा भोजन कर रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या आज कई परिवारों में देखने को मिल रही है, जहां बच्चे खेलकूद और आउटडोर गतिविधियों की बजाय मोबाइल और टीवी के सामने अधिक समय बिताते हैं।
बच्चों में तेजी से बढ़ रही हैं ये 5 समस्याएं
1. मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज
पहले मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज को मुख्य रूप से वयस्कों की बीमारी माना जाता था। लेकिन अब बच्चों में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि अधिक स्क्रीन टाइम और कम शारीरिक गतिविधि का सीधा संबंध बढ़ते वजन से है।
विशेषज्ञों के अनुसार मुंबई के 10 से 15 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में लगभग 38.3 प्रतिशत बच्चे ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में पाए गए।
2. आंखों की कमजोरी और मायोपिया
मोबाइल और टैबलेट की स्क्रीन को लंबे समय तक नजदीक से देखने से बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) के मामले बढ़ रहे हैं। कई अध्ययनों में स्क्रीन पर बिताए गए अतिरिक्त समय और आंखों की समस्याओं के बीच संबंध पाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आउटडोर गतिविधियों की कमी भी बच्चों में मायोपिया के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह है।
3. नींद की कमी
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है। यह हार्मोन अच्छी नींद के लिए जरूरी होता है। अधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है और उनका दैनिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
4. गर्दन और पीठ दर्द
लंबे समय तक झुककर मोबाइल देखने से बच्चों में गर्दन, कंधों और पीठ से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। पहले ये समस्याएं मुख्य रूप से वयस्कों और ऑफिस में लंबे समय तक बैठकर काम करने वाले लोगों में देखी जाती थीं।
5. तनाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। विभिन्न अध्ययनों में स्क्रीन टाइम और चिंता, तनाव, अवसाद तथा आक्रामक व्यवहार के बीच संबंध देखा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट का अत्यधिक उपयोग बच्चों के भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ. अविनाश डिसूजा (Dr. Avinash D’Souza) का कहना है कि आज के बच्चे प्रकृति और आउटडोर गतिविधियों से दूर होते जा रहे हैं। पहले बच्चे मैदानों में खेलते थे, पक्षियों को देखते थे और अपने आसपास की दुनिया को समझते थे, लेकिन अब उनका काफी समय स्क्रीन के सामने बीत रहा है।
उनके अनुसार बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए डिजिटल और वास्तविक दुनिया के बीच संतुलन बेहद जरूरी है।
बच्चों का स्क्रीन टाइम कैसे कम करें?
- बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार दें।
- रोजाना कम से कम 1 से 2 घंटे आउटडोर खेल के लिए प्रोत्साहित करें।
- भोजन के समय मोबाइल और टीवी का उपयोग बंद रखें।
- सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दें।
- पढ़ाई के लिए स्क्रीन का उपयोग हो तो भी समय सीमा तय करें।
- बच्चों को खेल, किताबें, कला और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ें।
- माता-पिता स्वयं भी स्क्रीन उपयोग का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करें।
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FAQ
क्या ज्यादा मोबाइल देखने से बच्चों का वजन बढ़ सकता है?
हां। लंबे समय तक स्क्रीन देखने और कम शारीरिक गतिविधि के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ सकता है।
क्या मोबाइल बच्चों की आंखों को नुकसान पहुंचाता है?
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर तनाव बढ़ सकता है और मायोपिया का खतरा बढ़ सकता है।
बच्चों के लिए कितना स्क्रीन टाइम सही है?
विशेषज्ञ उम्र के अनुसार सीमित स्क्रीन टाइम और अधिक आउटडोर गतिविधियों की सलाह देते हैं।
बच्चों में स्क्रीन टाइम कम करने का सबसे आसान तरीका क्या है?
परिवार के साथ समय बिताना, आउटडोर खेल, किताबें पढ़ना और स्क्रीन-फ्री भोजन का नियम बनाना प्रभावी उपाय माने जाते हैं।
सोर्स: नवभारत टाइम्स



