शिशु का दूध जैसा खून देखकर डॉक्टर भी रह गए हैरान, मुंबई में सामने आई दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी
मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती ढाई महीने की बच्ची की सामान्य जांच के दौरान डॉक्टरों ने ऐसा नजारा देखा, जो मेडिकल प्रैक्टिस में बेहद दुर्लभ माना जाता है। बच्ची का खून सामान्य लाल रंग का होने के बजाय गाढ़ा, क्रीमी और दूध जैसा सफेद दिखाई दिया। इसी असामान्य संकेत ने डॉक्टरों को एक बेहद दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी फैमिलियल लाइपोप्रोटीन लाइपेज डेफिशिएंसी (Familial Lipoprotein Lipase Deficiency-LPLD) का पता लगाने में मदद की और समय पर इलाज से बच्ची की जान बचाई जा सकी।
कैसे पता चला कि शिशु का खून दूध जैसा हो गया था?
द टाइम्स ऑफ इंडिया मे छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, बांद्रा निवासी दंपति की यह पहली संतान है, जिसका जन्म शादी के चार साल बाद हुआ था। 29 मई को बच्ची को मुंबई के बाई जेरबाई वाडिया हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रेन में भर्ती कराया गया, जहां जांच में उसका दिल सामान्य से बड़ा (Enlarged Heart) पाया गया।
रूटीन ब्लड टेस्ट के दौरान डॉक्टरों ने देखा कि बच्ची का खून सामान्य लाल रंग का नहीं बल्कि दूध जैसा सफेद और क्रीमी दिखाई दे रहा था। इसके बाद की गई विस्तृत जांच में पता चला कि बच्ची के ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर 42,000 mg/dL तक पहुंच चुका था, जो सामान्य स्तर से लगभग 300 गुना अधिक था।
इतनी अधिक मात्रा में रक्त में वसा (फैट) जमा होने के कारण खून का रंग बदल गया था। यह स्थिति पैंक्रियाटाइटिस, स्ट्रोक और हृदय संबंधी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती थी।
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क्या है फैमिलियल लाइपोप्रोटीन लाइपेज डेफिशिएंसी (LPLD)?
फैमिलियल लाइपोप्रोटीन लाइपेज डेफिशिएंसी (LPLD) एक बेहद दुर्लभ आनुवंशिक मेटाबॉलिक बीमारी है। इस बीमारी में शरीर में लाइपोप्रोटीन लाइपेज (Lipoprotein Lipase) नामक एंजाइम की कमी होती है, जो भोजन से मिलने वाले फैट को तोड़ने का काम करता है।
जब यह एंजाइम पर्याप्त मात्रा में नहीं बनता, तो ट्राइग्लिसराइड्स तेजी से खून में जमा होने लगते हैं। इससे शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं और जानलेवा जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी दुनिया में लगभग 10 लाख लोगों में से केवल एक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
डॉक्टरों ने कैसे बचाई बच्ची की जान?
बच्ची की गंभीर स्थिति को देखते हुए अस्पताल में पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी, जेनेटिक्स, न्यूट्रिशन, रेडियोलॉजी और आईसीयू विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम बनाई गई।
ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर तेजी से कम करने के लिए डॉक्टरों ने 16 दिनों तक बच्ची को मुंह से कोई भी आहार, यहां तक कि मां का दूध भी नहीं दिया, क्योंकि स्तनपान में प्राकृतिक रूप से वसा मौजूद होती है।
इस दौरान बच्ची को नसों के जरिए (Intravenous) पोषण दिया गया। स्थिति में सुधार होने पर डॉक्टरों ने बहुत कम वसा वाले स्किम्ड मिल्क पाउडर से नियंत्रित आहार शुरू किया।
इलाज के 19वें दिन बच्ची का ट्राइग्लिसराइड स्तर घटकर 242 mg/dL पर पहुंच गया। इसके साथ ही उसके खून का रंग सामान्य होने लगा और हृदय की कार्यक्षमता में भी काफी सुधार देखा गया।
क्या जीवनभर इलाज की जरूरत होगी?
डॉक्टरों के अनुसार, बच्ची की जान फिलहाल बचा ली गई है, लेकिन उसे पूरी जिंदगी विशेष देखभाल की आवश्यकता होगी।
उसे जीवनभर लो-फैट डाइट का पालन करना होगा ताकि ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर दोबारा न बढ़े। उम्र बढ़ने पर डॉक्टर जरूरत पड़ने पर कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं भी दे सकते हैं। साथ ही समय-समय पर मेटाबॉलिक विशेषज्ञों की निगरानी भी जरूरी होगी।
सही खानपान, नियमित जांच और चिकित्सकीय देखभाल के साथ LPLD से पीड़ित बच्चे सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।
फैमिलियल लाइपोप्रोटीन लाइपेज डेफिशिएंसी (LPLD) के लक्षण
यह बीमारी बेहद दुर्लभ होने के कारण इसकी पहचान आसान नहीं होती। शिशु का दूध जैसा खून केवल लैब जांच के दौरान ही पता चलता है। इसके अलावा निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं:
- ट्राइग्लिसराइड्स का अत्यधिक बढ़ जाना।
- बार-बार पेट में दर्द होना।
- लिवर या तिल्ली का बढ़ जाना।
- पैंक्रियाटाइटिस (अग्न्याशय में सूजन)।
- दूध या भोजन ठीक से न पीना।
- वजन का सामान्य रूप से न बढ़ना।
- थकान या चिड़चिड़ापन।
यदि डॉक्टरों को किसी आनुवंशिक मेटाबॉलिक बीमारी का संदेह होता है, तो इसकी पुष्टि के लिए जेनेटिक टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है।
क्रेडिट: द टाइम्स ऑफ इंडिया



